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क्रांतिदूत - पुस्तक समीक्षा

किसी भी सभ्यता के विध्वंस का कारण उसके समाज का अपने ही इतिहास से विमुख हो जाना है। जब तक एक समाज अपने इतिहास के प्रति सजग रहता है , उसके लिए पतन के गर्त से अपने अतीत की महानता के भाव को पुनर्जीवित करने की सम्भावना जीवित रहती है। संस्कृति के इस पुनर्जीवन के की प्रक्रिया में समाज के विचारकों का बहुत हाथ रहता है। इसी वैचारिक स्थितप्रज्ञता ने भारत को कई शताब्दियों के क्रूर विदेशी आधिपत्य के मध्य भी जीवित और जीवंत रखा। राजनैतिक पराभव को सांस्कृतिक पराभव में परिवर्तित करने का सर्वाधिक प्रयास भारत की राजनैतिक स्वाधीनता के पश्चात ही हुआ , यह एक विडम्बना रही है।   ऐसा नहीं है कि १९४७ के पश्चात भारतीय इतिहास के विषय में लिखा नहीं गया , परंतु एक हीनता , एक पराभव के बोध के साथ और बहुधा एक स्पष्ट सी वितृष्णा और उदासीनता के साथ लिखा गया। भारतीयों के मन मस्तिष्क में एक ऐसी लज्जा को भर दिया गया कि जो सभ्यता विदेशी इस्लामी अतिक्रमण के विरुद्ध
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