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Emergency in India

As the electoral fortunes of the Indian National Congress under the leadership of Rahul Gandhi goes bleaker every day, owing the the public disenchantment fast transforming into public disgust towards the entitled first family of the Congress which refuses to take any account of Public opinion and continues to stupidly drive the rhetoric-based campaign, they cling back the theme which has served the Family in all these years- Democracy is in danger. 
Today,  parachuted into the leadership, Priyanka Vadra, wife of Robert Vadra charged with the major corruption during UPA, spoke of stepping into politics as a savior of democracy, projecting her own desperate move as some sort of act of benevolence towards the nation for which the unwashed masses ought to be eternally indebted towards her and the first family. Rahul Gandhi, arriving in Manipur claimed that the political plank for the party will be saving the democracy. This is in continuance to the campaign conjured up by the Congress i…
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Ganjhon Ki Goshthi- Why and Wherefore?

From the world of Self- Publishing, where I have been writing, publishing and struggling to propagate my book, finally I have meandered into the world of formal publishing with the nudge, push and support from Indic Academy (http://www.indicacademy.org), with well, Hindi satire, Ganjhon Ki Goshthi
My previous books were in English, and with serious content, for two reasons, one, I was not sure about the receptiveness of readers towards Hindi and secondly, I did not know that I have in my writing style something which could be considered as the funny streak. I would read with awe and admiration of an apprentice and a student, the brilliant writing of great Triumvirate of Hindi Satire- Sharad Joshi, Shrilal Shukl and Harishankar Parsai. 
I have been wondering where has all that, sarcastic yet serene, brutal yet beautiful, writing in Hindi gone. Why is the humor scene, in general, so full of abuse and innuendo? I pondered and pondered and as Modi ji decided to pick up the broom to cle…

Know the Naxals- A brief look at the History

There have been many debates of late on the television, in the wake of the arrests of those who are now increasingly mentioned as the Urban Naxals. I am both shocked and amused at the same time to look at the audacity of the sympathizers of Naxal terrorism, in all their starched Saris and handloom Kurtas, when they hide behind the same constitution, that the want to overthrow. They are shrill, sophisticated, eloquent and deriding. They hate the common folks, and their disdain for those who work, create and make a living, peeps through their elitist smiles. They are mostly ideologues (yes, that is some work for sustenance in the modern scheme of things), academics and well, ostensibly, writers and poets. The fact remains that when communism is the scheme of things, Naxal notices mentioning Jan Adaalats in the villages of Chattisgarh too become work of art, and corpses hanging from the electricity poles, become equivalent of art work on the roof of Sistine chapel.
The other day, Ms. Arun…

बुद्धिजीवियों की बारात

बुद्धिजीवियों की बारात
शरद जी रिटायर हो चुके थे। आधार का भय आधारहीन मान कर आधार बनवा चुके थे, और पेंशन प्राप्त कर के भोपाल मे जीवनयापन कर रहे थे। एक बार बिहार जा कर शरद जी नरभसा चुके थे, पुन: नरभसाने का कोई इरादा था नहीं, सो मामाजी के राज में स्वयं को सीमित कर के रखे हुए थे। इस्लाम आज कल ख़तरे मे नही आता था, संभवत: इमर्जेंसी के बाद से, इस्लाम सबल हो चुका था, और कल निपचती जींस और लोकतंत्र के ख़तरे मे रहने का दौर चल रहा था। न्यू मार्केट के कॉफ़ी हाऊस मे चंद बुद्धिजीवी लोकतंत्र पर आए संकट पर चर्चा कर लेते थे, जोशी जी वहाँ भी नहीं जाते थे। एक दफे वहाँ के मलियाली वेटर्स को जोशी जी के हिंदी लेखक होने का पता चल गया और उन्होंने जोशीजी को यिंदी यिम्पोजीशन के विरोध मे कॉफ़ी देने से मना कर दिया था। कहाँ शरदजी सरस्वती से ब्रह्मप्रदेश तक लिखना चाहते थे और कहाँ उन्हे बड़े तालाब के उत्तर भाग का लेखक घोषित कर दिया गया था। इस से क्षुब्ध जोशी जी अपने बग़ीचे मे टमाटर उगा रहे थे। जानने वाले कहते हैं कि इसके पीछे उनकी मँशा महान किसान नेता बन कर उभरने की थी, किंतु उन्हे पता चला कि आधुनिक किसान नेता किसानों को …

Remembering the Forgotten - On 15th of August

The year is 2018. It is 72 years since we made the tryst with destiny. Pt. Jawaharlal Nehru made that tryst with destiny, and as it turned out, with the passage of time it became a tryst with dynasty. The history was appropriated with a clinical precision. My intention is not to judge, or reduce the exalted stature of those who fought for the freedom and eventually came to believe that the nation they had emancipated is their fiefdom, and that the people of the nation are bound to remain indebted to them, in perpetuity, generation after generation, for their real  or imagined heroics of the past. 
Every independence day is marked by two things- perfunctory remembrance of the heroes of the past who could add to the glory of a pathetic polity of the present, a new tendency of the people to belittle the nation on the grounds that we are not the best nation in the world. The first category of people will appropriate the glory of the past, claiming the credit of all the good that is a part …

क़र्ज़ की पीते थे मय

धर्म संकट में है, धर्म ध्वजा धूलि-धूसरित हवा में कटी छिपकली की पूँछ की तरह फड़फड़ा रही है। लेनदारों के भय से,चेहरे पर रूमाल बाँध कर पिछवाड़े के रास्ते से घर से पलायन करने वाले भी राह चलतों को पकड़ कर दरयाफ़्त करते हैं - भई, देश का क्या होगा। उदारीकरण के पथप्रदर्शकों ने उधार दिया, और जम कर दिया। बाज़ार में ऐसी तरलता लाई गई कि आज भी राष्ट्र कल्लू हलवाई की तोंद की तरह थिरक रहा है। एक चकाचौंध भरी तरक़्क़ी यूँ चमकी सारे देश ने करूणानिधि वाले चश्मे चढ़ा लिए। उदारिकरण के अँधे को सब हरा ही हरा दीखता था।
जैसे मुग़ल सुल्तान गले से मोतियों की माला बेहतरीन रक्कासा की ओर ऊछालते थे, लोन उछाले गए और तत्परता से पकड़े गए। पिछली सरकार से यह स्नेह भरी भेंट प्राप्त करने वाले लोग उत्पादकता में कम विलासिता में अधिक विश्वास रखते थे।
अमीर के घर के कैलेंडर पर अल्प-वस्त्र धारिणी के वस्त्र और ग़रीब के घर के गैस सिलेंडर कम होते गए और राष्ट्र उधार की उन्नति की आनंद लहर में हिचकोले लेता गया। समय की मार देखें कि सरकार बदली और जो भारतीय संस्कृति की बात करते थे उन्होंने ही भारतीय संस्कृति की विरासत को विराम दिया।
हिंदुस्…

महाभियोग पर महाभारत

भारत बहुत ही मज़ेदार राष्ट्र है, सुप्रीम कोर्ट ने खाप पर प्रतिबंध लगाया। अब खाप जुटा है सर्वोच्च न्यायालय पर प्रतिबंध लगाने में ।
भारत में जनतंत्र आरंभ से ही ख़तरे में रहा है। कभी यह सत्तर के दशक के सिनेमा में नायक की माँ की तरह ख़तरे में रहा, कभी नब्बे के दशक के नायक की बहन के रूप में। ख़तरे के प्रकार और ख़तरे की तीव्रता घटती बढ़ती रही परंतु लोकतंत्र से ख़तरा कभी ना टला।
इस सबके बावजूद जनता की जनतंत्र में भारी श्रद्धा रही। जनतंत्र ख़तरे में है - की गुहार पर वो वीरता नसों में दौड़ जाती थी कि बहुधा यह संकट भी प्रस्तुत हुआ कि लोकतंत्र के रक्षकों से लोकतंत्र की रक्षा कैसे की जाए?
लोकतंत्र पर आए ख़तरे से लड़ने के लिए ही भारत में पहली बार आपातकाल लगाया गया। दो वर्ष तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को काँग्रेस के सुरक्षित गोदामों में छोड़ कर, एक सच्चे प्रेमी की भाँति कृतज्ञ राष्ट्र - तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना - की तर्ज़ पर, सत्ता की ओर तकता रहा।
लोकतंत्र के चाचाजी की पुत्री ने विदेशी हाथ पर आक्षेप लगाया और न्यायालय को पलट दिया। एक जादुई परिवेश में भारत भटकता रहा जहाँ कोई भी युवा, कि…