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Remembering the Forgotten - On 15th of August

The year is 2018. It is 72 years since we made the tryst with destiny. Pt. Jawaharlal Nehru made that tryst with destiny, and as it turned out, with the passage of time it became a tryst with dynasty. The history was appropriated with a clinical precision. My intention is not to judge, or reduce the exalted stature of those who fought for the freedom and eventually came to believe that the nation they had emancipated is their fiefdom, and that the people of the nation are bound to remain indebted to them, in perpetuity, generation after generation, for their real  or imagined heroics of the past. 
Every independence day is marked by two things- perfunctory remembrance of the heroes of the past who could add to the glory of a pathetic polity of the present, a new tendency of the people to belittle the nation on the grounds that we are not the best nation in the world. The first category of people will appropriate the glory of the past, claiming the credit of all the good that is a part …
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क़र्ज़ की पीते थे मय

धर्म संकट में है, धर्म ध्वजा धूलि-धूसरित हवा में कटी छिपकली की पूँछ की तरह फड़फड़ा रही है। लेनदारों के भय से,चेहरे पर रूमाल बाँध कर पिछवाड़े के रास्ते से घर से पलायन करने वाले भी राह चलतों को पकड़ कर दरयाफ़्त करते हैं - भई, देश का क्या होगा। उदारीकरण के पथप्रदर्शकों ने उधार दिया, और जम कर दिया। बाज़ार में ऐसी तरलता लाई गई कि आज भी राष्ट्र कल्लू हलवाई की तोंद की तरह थिरक रहा है। एक चकाचौंध भरी तरक़्क़ी यूँ चमकी सारे देश ने करूणानिधि वाले चश्मे चढ़ा लिए। उदारिकरण के अँधे को सब हरा ही हरा दीखता था।
जैसे मुग़ल सुल्तान गले से मोतियों की माला बेहतरीन रक्कासा की ओर ऊछालते थे, लोन उछाले गए और तत्परता से पकड़े गए। पिछली सरकार से यह स्नेह भरी भेंट प्राप्त करने वाले लोग उत्पादकता में कम विलासिता में अधिक विश्वास रखते थे।
अमीर के घर के कैलेंडर पर अल्प-वस्त्र धारिणी के वस्त्र और ग़रीब के घर के गैस सिलेंडर कम होते गए और राष्ट्र उधार की उन्नति की आनंद लहर में हिचकोले लेता गया। समय की मार देखें कि सरकार बदली और जो भारतीय संस्कृति की बात करते थे उन्होंने ही भारतीय संस्कृति की विरासत को विराम दिया।
हिंदुस्…

महाभियोग पर महाभारत

भारत बहुत ही मज़ेदार राष्ट्र है, सुप्रीम कोर्ट ने खाप पर प्रतिबंध लगाया। अब खाप जुटा है सर्वोच्च न्यायालय पर प्रतिबंध लगाने में ।
भारत में जनतंत्र आरंभ से ही ख़तरे में रहा है। कभी यह सत्तर के दशक के सिनेमा में नायक की माँ की तरह ख़तरे में रहा, कभी नब्बे के दशक के नायक की बहन के रूप में। ख़तरे के प्रकार और ख़तरे की तीव्रता घटती बढ़ती रही परंतु लोकतंत्र से ख़तरा कभी ना टला।
इस सबके बावजूद जनता की जनतंत्र में भारी श्रद्धा रही। जनतंत्र ख़तरे में है - की गुहार पर वो वीरता नसों में दौड़ जाती थी कि बहुधा यह संकट भी प्रस्तुत हुआ कि लोकतंत्र के रक्षकों से लोकतंत्र की रक्षा कैसे की जाए?
लोकतंत्र पर आए ख़तरे से लड़ने के लिए ही भारत में पहली बार आपातकाल लगाया गया। दो वर्ष तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को काँग्रेस के सुरक्षित गोदामों में छोड़ कर, एक सच्चे प्रेमी की भाँति कृतज्ञ राष्ट्र - तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना - की तर्ज़ पर, सत्ता की ओर तकता रहा।
लोकतंत्र के चाचाजी की पुत्री ने विदेशी हाथ पर आक्षेप लगाया और न्यायालय को पलट दिया। एक जादुई परिवेश में भारत भटकता रहा जहाँ कोई भी युवा, कि…

बच्चों में कोई भेद नहीं

बच्चों में कोई भेद नहीं 
अनदेखे ख़्वाबों की दो आँखें, जिन्होंने स्वप्न देखने की आयु से पूर्व दु:स्वप्न देख आँखें मूँद लीं। जो क़दम अभी चलना ही सीखे थे, लड़खड़ा कर थम गए। बचपन के घुटने की हर खरोंच, व्यस्कों के गाल पर एक तमाचा है।
धर्म के आडंबरों से अछूता बाल मन जो मंदिरों और मस्जिदों को अपनी आत्मा में रखता था, धर्म की दरारों पर अपना नन्हा शव छोड़ निकल पड़ा। कहीं दूर,दग्ध शरीर के ताप से दूर, जब यह अकलुषित हृदय पहुँचा तो एक और निष्पाप दूधिया आत्मा दिखी, जिसकी पलकों के कोरों में उसकी आँखों के जैसे ही अविश्वास से सहमा हुआ अश्रु रूका था।
एक दूसरे के गले लग कर दोनों बाल मन दरिया के टूटे बाँध की तरह बह निकले। घाव बाँटे, एक दूसरे के हृदय में चुभी धरती की किरचें निकाली और न देखे हुए स्वप्नों का श्राद्ध रचा। उसने थमती हिचकियों में अपना नाम बताया - असीफा । और दुख के साथी की ठोड़ी थाम कर कहा - "मत रो, न्याय होगा।"
धरती की तरफ़ नन्ही गुलाबी उँगली दिखा कर कहा- “देख, भले लोग लड़ रहे है मेरे लिए, न्याय होगा। तेरे लिये भी लड़ रहे होंगे। तू मत रो”
फिर बोली, “मैं पश्चिम से हूँ, तू पूरब से, पर हैं त…

अनशन के आवश्यक अंश

अनशन के आवश्यक अंश
भारतीय राजनीति में भूख का अभूतपूर्व स्थान है। बँग-भंग के समय से भूख भारतीय राजनीति की दशा का निर्धारण करती रही है और राजनीति के रथ के पहिए की धुरी रही है। एक प्लेट पूड़ी सब्ज़ी राजनैतिक जनसभाओं की सफलता का, और ग़रीबों की थाली में सजी भूख चुनावी निर्णयों का निर्धारण करती रही है। यह चुभती हुई भूख जो पुरूषों के पौरुष और नारियों के सतीत्व का सौदा बन के सात दशकों तक ऐसे समाज में सन्निहित हो गई कि आम भारतीय -ऊ तो होबे करता है - कह कर निकल लेता है।
किन्तु इस राजनैतिक छल और प्रशासनिक विफलता के चूहों द्वारा खाए गए फ़ूड कार्पोरेशन के अनाज से क्रान्ति नहीं होती। क्रान्ति होती है स्वैच्छिक भूख से जिसकी नींव गाँधी जी ने डाली और जिसे उन्होंने हर सामाजिक प्रश्न के समाधान के रूप में भारतीय जनता के सामने परोसा। 
इस भूख के शस्त्र को हर मिडिल क्लास युवक ने अपनी बात मनवाने को भोजन त्याग कर चुपके से पिज़्ज़ा आर्डर करते हुए उपयोग किया है। श्री अन्ना हज़ारे एवम् श्री अरविंद केजरीवाल ने इस लुप्त होती कला का पुनरूत्थान किया। भूख के इस शस्त्र रूप के लिये कई चीज़ेो की आवश्यकता होती है और इस स्वै…

बसेसर कुछ नहीं समझता

बसेसर कुछ नहीं समझता

स्मार्टफ़ोन की पिछले साल खुली फ़ैक्टरी से बाहर आकर उसने टैक्सी पकड़ ली। आज तनख़्वाह मिली थी। इस महीने घर के लिए ज़्यादा पैसे भेजने थे। जानता था पिताजी के चेहरे पर पिछले दशकों से गिरी झुर्रियों के कैक्टस मे मुस्कान का सूरज उगेगा। पुत्र के भेजे पैसे पिता का घर नहीँ चलाते पर रिश्ते की निरंतरता के लिए आवश्यक होते हैं और सफ़ेद मूँछों को सम्बल होते हैं। माँ ज़रूर चिंता करेगी कि सब पैसे ख़र्च करेगा तो प्रायवेट नौकरी में उसके ख़ुद के बुढ़ापे का क्या होगा? उसने सोचा इस बार माँ को प्रधानमंत्री पेंशन स्कीम के बारे में ज़रूर बताएगा। कब तक माँ उसे बच्चा ही मानती रहेगी और उसके बुढ़ापे की फ़िक्र भी अपनी पीठ पर ढ़ोती रहेगी। माँ ही अपने पुत्र में आता बुढ़ापा और जाता बचपन एक साथ रूका हुआ देख सकती है। याद आया, माँ को देखे बहुत समय हो गया। मन कमज़ोर हो गया। माँ की याद से हमेशा ही ऐसा होता है, मन बालक होने के व्याकुल हो उठता है। याद आया बचपन में चूल्हे के पास बैठ पहाड़े याद करना और ममता की आत्मा को धीमे धीमे, हर रोज़, धुएँ में बुझते हुए देखना।
पिछले दो महीने से फ़ोन पर माँ की खाँसी कम औ…

Night and Day- By Virginia Woolf- Book Review

Literature doesn't levitate over the messy mayhem of life. It is not a flower which blooms in isolation. Stories begin to breathe in the cusp of social context and the characters of the story. The delicate balance between the data and the desire, statistics and the sublime texture of human feelings extending between the individual and the environment- is where Literature finds its feet. The success and failure of a writer lies in reaching this place of perfect balance. If she leans too much towards the environment, she ends up writing propaganda pamphlet; if she leans totally towards the individual, she ends up writing a handicapped story resembling a diary, written from the perspective of one individual only.  Even when someone like Dostoevsky writes Notes from the Underground, which largely happens within the mind of the protagonist, there is still a definite sense of society in which the individual exists, even if by implication. 

Night and Day, which is the second novel of the …