Skip to main content

Cool breeze in summer


You are the drop of dew,
After a long journey through
the seemingly never-ending desert.
Surviving a summer,
blistering through the heat,
as I reach some kind of oasis
to find Gods reaching our to me,
with their heavenly hands,
handing me over
a sweet, tiny figure,
which stares at me with a toothless, trusting face.
It is in fact, less of a face,
rather,
beyond the softness of tiny palms,
beyond the gums
pink in anticipation of teeth yet to emerge,
beyond the unsure arms
stretched towards m.
It is the promise that those blue eyes
hold for me,
The promise which my daughter whispers to me
through softly spoken mono-syllables
"Even though I may not understand
a word of the gibberish you people seem to speak,
I understand you, baba,
the way you have never been understood before,
I am the happiness of the opera
that dawns on the audience,
after the fat lady has sung."

Comments

Popular posts from this blog

बाल विवाह - हिंदू इतिहास और सत्य

  इतिहास का लेखन उसकी विसंगतियों की अनुक्रमिका नहीं वरन उसके समाज के आम रूप से स्वीकृत मान्यताओं एवं उस समाज के जननायकों द्वारा स्थापित मानदंडों के आधार पर होना चाहिए। परंतु जब लेखनी उन हाथों में हो जिनका मंतव्य शोध नहीं एक समाज को लज्जित करना भर हो तो समस्या गहन हो जाती है। जब प्रबुद्ध लोग कलम उठाते हैं और इस उद्देश्य के साथ उठाते हैं कि अप्रासंगिक एवं सदर्भहीन तथ्यों के माध्यम से समाज की वर्ग विभाजक रेखाओं को पुष्ट कर सकें तो हमारा कर्तव्य होता है कि हम सत्य को संदर्भ दें और अपने इतिहास के भले बुरे पक्षों को निर्विकार भाव से जाँचें।   बीते सप्ताह बाल विवाह को लेकर विदेशी सभ्यता में उठे प्रश्नों को भारत की सभ्यता पर प्रक्षेपित करके और उसकी स्वीकार्यता स्थापित करने पर बड़ी चर्चा रही। इस संदर्भ में   श्री ए एल बाशम से ले कर राजा राम मोहन रॉय तक चर्चा चली। बाशम की पुस्तक द वंडर दैट वाज इंडिया - को उद्धृत कर ले कहा गया कि हिं

कायस्थ- इतिहास एवं वर्तमान परिपेक्ष्य

सत्यम , दानम , क्षमा शीलमानृशंस्य तपो घृणा। दृश्यंते यत्र नागेंद्र स ब्राह्मण इति स्मृतः।। ( हे सर्पराज , जिसमें सत्य , दानशीलता , क्षमा , क्रूरतारहित भाव , तप एवं संवरण , एवं संवेदना हो , वह मनुष्य को ही ब्राह्मण मानना चाहिए। ) शुद्रे तु यद् भवेल्लक्षम द्विजे तच्च न विद्दयते। न वै शूद्रों भवेच्छुद्रो ब्रह्मणो न च ब्राह्मण : ।। ( यदि शूद्र में यह गुण हैं ( सत्य , दान , अक्रोध , अहिंसा , तप , संवरण एवं संवेदना ) और ब्राह्मण में यह गुण परिलक्षित ना हों तो वह शूद्र शूद्र नहीं , ब्राह्मण है ; और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है। )  - युधिष्ठिर - नहुष संवाद , अजगर कांड , महाभारत , वन पर्व   वर्तमान परिपेक्ष्य में जिसे जाति कहा जाता है , वह वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप है। सनातन धर्म का वर्ण जहाँ समाज को व्यवसाय एवं क्षमता के अनुरूप व्यवस्थित करने का प्रयास था और कर्म पर आधारित था , जाति उसी व्यवस्था का विघटित रूप बन कर जन्मगत व्यवस्था बन गई। जाति या कास्ट पुर्तगाल

Pathaan and Polarisation- Movie Review

Many have not seen Pathan, I have. I have a huge tolerance towards stupid movies and I love to watch all sort of movies. What has bothered me most about Pathaan is that in terms of content and characterisation, it is absolutely shoddy, much worse than much lampooned RaOne AND there is no review which openly tells you about it.  Most reviewers have reviewed the movie like a teenager, gushing over VFX generated body of ShahRukh Khan. This reminds me of my schoolmates bunking classes to watch tomato-sauce-laced movies of Ramsey brothers, gushing over semi-nude voluptuous actresses in the late 80s. Only difference being that those were school kids in class XII, with raging hormones and a stupefied intellect when a world around them was fast changing. Here we have middle-aged professional movie reviewers guiding people to their way in or out of Movie theatres. Their primary argument in favour of the movie is nothing but beefed up Shahrukh Khan and the gap between his earlier movie and this