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The Moon, the Earth and the Ship

The Moon always revolves around the Earth,




Just as the Earth around the Sun,



It is the larger entity which



Always provides the axis to the smaller one,



That is what I took as the law of the nature,



and shunned out of my mind



any thoughts of what would happen,



If one day things happen otherwise.



Long time back,



As a young man in love,



Many a times,



sat on the shores of Mumbai,



Watching the Sun going down



As I tried to catch my breath



in the maddening, pace of the City of no sleep;



And thought of my love



Whose sole occupation those days



was to be love-lorn and misty eyed.



I saw large, gigantic ships floating



Close to the shore,



Unmindful of my lazy gaze and thought,



How could such enormous shapes



depend on a small anchor



dropped to the foot of the sea



To hold them to the shore,



In the middle of huge waves,



with no respect for anyone but Sun and Moon.



Today, as loneliness struck,



So deep that voiceless tears



washed away my conscience,



I held a heartbeat close to my chest,



the sole sound which marked



the epilogue to the book of my life,



few month before I actually saw



Pink small palms encircling my finger.



And suddenly I understood,



Earth will probably revolve around the Moon



when it is as crest-fallen as I am today,



and how a small piece of Iron could hold



the large ship together,



through the gravest of the tempests.




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