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And all came tumbling Down- 2G, 3G..and so and so Jee

Supreme court of India makes a landmark judgement cancelling 122 telecom licences. This flies in the face of the argument of telecom minister who had termed it as zero loss. It would have been worth his while if he had checked as to why the same spectrum went out at 16 crore per MHz in 2G, when the same could bring in 180 crore per MHz in an open auction.
Dr. Subramanium Swamy comes out as a proud crusader, who fought a lonely battle and lived to tell it. Industry raises concern that this will impact investment which is absolutely confusing. When Enron did not impact US market as investment destination. My view is that it will undoubtedly create some temporary volatility, but it will eventually proclaim the lofty height of Indian justice systems which it, even in today's gloomy world is capable of scaling to when called for. I suppose, only market
I find a peg in the otherwise disbalanced world and not only because the same minister who drives the ministry now, runs ministry of education, an eloquent writer looking for ways to censure internet and can not even ensure a decent school for my child when I in my limited intelligence could not fathom the meaning of right to education.

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बुद्धिजीवियों की बारात

बुद्धिजीवियों की बारात
शरद जी रिटायर हो चुके थे। आधार का भय आधारहीन मान कर आधार बनवा चुके थे, और पेंशन प्राप्त कर के भोपाल मे जीवनयापन कर रहे थे। एक बार बिहार जा कर शरद जी नरभसा चुके थे, पुन: नरभसाने का कोई इरादा था नहीं, सो मामाजी के राज में स्वयं को सीमित कर के रखे हुए थे। इस्लाम आज कल ख़तरे मे नही आता था, संभवत: इमर्जेंसी के बाद से, इस्लाम सबल हो चुका था, और कल निपचती जींस और लोकतंत्र के ख़तरे मे रहने का दौर चल रहा था। न्यू मार्केट के कॉफ़ी हाऊस मे चंद बुद्धिजीवी लोकतंत्र पर आए संकट पर चर्चा कर लेते थे, जोशी जी वहाँ भी नहीं जाते थे। एक दफे वहाँ के मलियाली वेटर्स को जोशी जी के हिंदी लेखक होने का पता चल गया और उन्होंने जोशीजी को यिंदी यिम्पोजीशन के विरोध मे कॉफ़ी देने से मना कर दिया था। कहाँ शरदजी सरस्वती से ब्रह्मप्रदेश तक लिखना चाहते थे और कहाँ उन्हे बड़े तालाब के उत्तर भाग का लेखक घोषित कर दिया गया था। इस से क्षुब्ध जोशी जी अपने बग़ीचे मे टमाटर उगा रहे थे। जानने वाले कहते हैं कि इसके पीछे उनकी मँशा महान किसान नेता बन कर उभरने की थी, किंतु उन्हे पता चला कि आधुनिक किसान नेता किसानों को …

दो जोड़ी नन्ही आँखें

अनदेखे ख़्वाबों की दो जोड़ी नन्हीआँखें, जिन्होंने स्वप्न देखने की आयु से पूर्व दु:स्वप्न देख आँखें मूँद लीं। जो क़दम अभी चलना ही सीखे थे, लड़खड़ा कर थम गए।
बचपन के घुटने पर लगी हर खरोंच, व्यस्कों के गाल पर एक तमाचा है।

धर्म के आडंबरों से अछूता बाल मन जो मंदिरों और मस्जिदों को अपनी आत्मा में रखता था, धर्म की दरारों पर अपना नन्हा शव छोड़ निकल पड़ा। कहीं दूर,दग्ध शरीर के ताप से दूर, जब यह अकलुषित हृदय पहुँचा तो एक और निष्पाप दूधिया आत्मा दिखी, जिसकी पलकों के कोरों में उसकी आँखों के जैसे ही अविश्वास से सहमा हुआ अश्रु रूका था।

एक दूसरे के गले लग कर दोनों बाल मन दरिया के टूटे बाँध की तरह बह निकले। घाव बाँटे, एक दूसरे के हृदय में चुभी धरती की किरचें निकाली और न देखे हुए स्वप्नों का श्राद्ध रचा।

उसने थमती हिचकियों में अपना नाम बताया - ‘आसिफा’।

और दुख के साथी की ठोड़ी थाम कर कहा - ‘मत रो, न्याय होगा।’

धरती की तरफ़ नन्ही गुलाबी उँगली दिखा कर कहा- “देख, भले लोग लड़ रहे है मेरे लिए, न्याय होगा। तेरे लिये भी लड़ रहे होंगे। तू मत रो”

फिर बोली, “मैं पश्चिम से हूँ, तू पूरब से, पर हैं तो दोनों बच्चे। …

The Myth of Mughal Greatness- Socio-Economic Analysis

Ye imaarat o Maqabir ye fasilein ye hisaar, Mutlaq-ul-hukm shahanshahon ki azmat ke sutoon; Seena-e-dahar ke nasoor hain kohna nasoor, Jazb hain unmein tere mere ajdaad ka khoon. 
– Sahir Ludhianvi
(Maqabir- Graves, hisaar- Fortress, Mutlaq-ul-hukm- Sovereign, azmat- Greatness, sutoon- Pillars, Seena-e-dahar-The chest of the world, kohna- Ancient, Azdaad- Ancestors)
The above couplet from Sahir’s famous Nazm, Taj Mahal, loosely translates as below:
“These grand graves, and these high-walls of the majestic fortresses, Are the pillars of the brutal majesty of the sovereign dictators. These gaping wounds are the ancient wounds on the breast of the world, Mingled with the ugly pus and the oozing bloods of our common ancestors.”
In today’s world where the intellectual mind stands divided on communal lines with even daughters of noted Urdu poets like Munawwar Ranaproudly declaring first to be a Muslim and then to be an India, it is no wonder that these couplets of Sahir, a proud secularist India rem…