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Some Stray and Broken Thoughts- Poems on Weekend

This weekend, the mind is numb and heart is beating with some heaviness. The skies are unkind and the weather is unforgiving. Wrote some poems today, which I am putting here as this week's post.

A Noisy Silence
A silence
So loud
Hangs in the room
That it
Pierces through the hearing
And in the din of it
Drowns all
The soft and mild
Whispers of sweet love.


A Gift to be Earned

Love,
is not a divine entitlement.
The very idea of
love\

on account of being what you are
is flawed.
It is a right to be earned
you need to
struggle,
Get cleansed and grow,
into better being,
... Else it is all
narcissism
or sheer stupidity.


It is everything
but love,
admiration, infatuation
anything, but love.

(c) Saket Suryesh


Apart from this, a Short Story, Betrayed by Time got a life today, which I will share in following week. This is the second short story I wrote, after The Death of a Soldier which I wrote some time back.
 

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शरद जी रिटायर हो चुके थे। आधार का भय आधारहीन मान कर आधार बनवा चुके थे, और पेंशन प्राप्त कर के भोपाल मे जीवनयापन कर रहे थे। एक बार बिहार जा कर शरद जी नरभसा चुके थे, पुन: नरभसाने का कोई इरादा था नहीं, सो मामाजी के राज में स्वयं को सीमित कर के रखे हुए थे। इस्लाम आज कल ख़तरे मे नही आता था, संभवत: इमर्जेंसी के बाद से, इस्लाम सबल हो चुका था, और कल निपचती जींस और लोकतंत्र के ख़तरे मे रहने का दौर चल रहा था। न्यू मार्केट के कॉफ़ी हाऊस मे चंद बुद्धिजीवी लोकतंत्र पर आए संकट पर चर्चा कर लेते थे, जोशी जी वहाँ भी नहीं जाते थे। एक दफे वहाँ के मलियाली वेटर्स को जोशी जी के हिंदी लेखक होने का पता चल गया और उन्होंने जोशीजी को यिंदी यिम्पोजीशन के विरोध मे कॉफ़ी देने से मना कर दिया था। कहाँ शरदजी सरस्वती से ब्रह्मप्रदेश तक लिखना चाहते थे और कहाँ उन्हे बड़े तालाब के उत्तर भाग का लेखक घोषित कर दिया गया था। इस से क्षुब्ध जोशी जी अपने बग़ीचे मे टमाटर उगा रहे थे। जानने वाले कहते हैं कि इसके पीछे उनकी मँशा महान किसान नेता बन कर उभरने की थी, किंतु उन्हे पता चला कि आधुनिक किसान नेता किसानों को …

दो जोड़ी नन्ही आँखें

अनदेखे ख़्वाबों की दो जोड़ी नन्हीआँखें, जिन्होंने स्वप्न देखने की आयु से पूर्व दु:स्वप्न देख आँखें मूँद लीं। जो क़दम अभी चलना ही सीखे थे, लड़खड़ा कर थम गए।
बचपन के घुटने पर लगी हर खरोंच, व्यस्कों के गाल पर एक तमाचा है।

धर्म के आडंबरों से अछूता बाल मन जो मंदिरों और मस्जिदों को अपनी आत्मा में रखता था, धर्म की दरारों पर अपना नन्हा शव छोड़ निकल पड़ा। कहीं दूर,दग्ध शरीर के ताप से दूर, जब यह अकलुषित हृदय पहुँचा तो एक और निष्पाप दूधिया आत्मा दिखी, जिसकी पलकों के कोरों में उसकी आँखों के जैसे ही अविश्वास से सहमा हुआ अश्रु रूका था।

एक दूसरे के गले लग कर दोनों बाल मन दरिया के टूटे बाँध की तरह बह निकले। घाव बाँटे, एक दूसरे के हृदय में चुभी धरती की किरचें निकाली और न देखे हुए स्वप्नों का श्राद्ध रचा।

उसने थमती हिचकियों में अपना नाम बताया - ‘आसिफा’।

और दुख के साथी की ठोड़ी थाम कर कहा - ‘मत रो, न्याय होगा।’

धरती की तरफ़ नन्ही गुलाबी उँगली दिखा कर कहा- “देख, भले लोग लड़ रहे है मेरे लिए, न्याय होगा। तेरे लिये भी लड़ रहे होंगे। तू मत रो”

फिर बोली, “मैं पश्चिम से हूँ, तू पूरब से, पर हैं तो दोनों बच्चे। …

The Myth of Mughal Greatness- Socio-Economic Analysis

Ye imaarat o Maqabir ye fasilein ye hisaar, Mutlaq-ul-hukm shahanshahon ki azmat ke sutoon; Seena-e-dahar ke nasoor hain kohna nasoor, Jazb hain unmein tere mere ajdaad ka khoon. 
– Sahir Ludhianvi
(Maqabir- Graves, hisaar- Fortress, Mutlaq-ul-hukm- Sovereign, azmat- Greatness, sutoon- Pillars, Seena-e-dahar-The chest of the world, kohna- Ancient, Azdaad- Ancestors)
The above couplet from Sahir’s famous Nazm, Taj Mahal, loosely translates as below:
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