Skip to main content

सैनिक का उत्तर- A Soldier's Response




"It is true that the intellect by itself is no virtue....An intellectual person can be a good man but he may easily be a rogue. Similarly an intellectual class may be a band of high-souled persons, ready to help, ready to emancipate erring humanity or it may easily be a gang of crooks.."
                            - Dr. B. R. Ambedkar

The problem of too much of intellectualism is that it runs a serious danger of turning narcissistic and base. A strong intellect without a sense of morality will make worse of human beings for they can explain, define and defend basest of their actions and thoughts. Dr. Partha Chatterjee, Professor at Columbia University, has suddenly become a known face all across India by scathing criticism he has heaped on the Chief of Indian Army General Bipin Rawat. He has compared the Army Chief with British General Dyer. It is difficult to understand how the context of Major Gogoi using a Stone-pelter (who also made Shawls) to avoid needless bloodshed to compare General Rawat with General Dyer, who shot dead over 300 citizens in cold blood. General Dyer had also placed a condition for Indians to crawl in a patch of street of around 200 feet, but that is another matter. A good writing is meant to provoke and unfortunately some writers would even a lie to provoke to avoid hard effort of getting down to the ground. Our intellectual world sadly, is at a loss since we do not have Hemingways to go to the front to write about war. A soldier is bound by discipline and cannot reply to crafty, cruel and crude allegations. Therefore, as a citizen, I take it as my duty to respond. 

Here it is. 



सैनिक का उत्तर


पूछते हो प्रश्न तुम, बस मौन है उत्तर मेरा।
योद्धा हूँ तो क्यूँ समझते हो हृदय
पत्थर मेरा।

जब प्रलय सा मेह बरसा, 
जलमग्न हुई थी ये धरा,
निष्पाप मन से था उपस्थित
मैं संतरी बन कर खड़ा।

जिस मनुज के पास हो
नन्ही सी इक तलवार भी,
सहन करता कौन मानव
छोटा सा इक प्रहार भी?

पाषाण की बौछार में भी
शाँत मेरा शस्त्र था।
विश्वास था, उस ओर भी
शत्रु नहीं एक मित्र था।

तुम समझते हो कि मैं मानव नहीं
इक यंत्र हूँ,
यज्ञ की इक आहुति हूँ,
रामबाण इक मंत्र हूँ।

मैं भी पिता का पुत्र हूँ, 
माता का इक संबल हूँ मैं,
पुत्री का मैं भी तात हूँ, 
सिन्दूर हूँ, आँचल हूँ मैं।

समय के इस क्रूर समर में
शाँत शौर्य का धर्म हूँ मैं।
राष्ट्र का सूचक हूँ मैं
इस मातृभूमि का मर्म हूँ मैं।

शब्दों के कुटिल कवि
तुमसे मेरा क्या मेल है।
मेरे लिये है राष्ट्र गौरव
आपको सब खेल है।

शब्दों के निर्लज्ज द्वन्द में
झुका दोगे भला क्या सर मेरा?
मस्तक है यह इस राष्ट्र का,
बस मौन है उत्तर मेरा।

      - साकेत
Post a Comment

Popular posts from this blog

कांग्रेस संत समागम - Congress Sant Samagam

आज रात्रि जब प्रात:काल डिम्पल बाबा जागे, उनका हृदय नई ऊर्जा से प्रकाशमान था। कल ही काँग्रेस कार्यकारिणी ने उनकी तुलना किसी अचार से की थी और ध्वनिमत से सनातन धर्म का रक्षक बताया था। डिम्पल बाबा के बताया गया था कि अचार बनने के बाद हिंदू धर्म ध्वजा की रक्षा का दायित्व उन पर बैठता है। बाबा को खुद को पिकल कहा जाना पसंद तो नहीं आया था और वह जानना चाहते को अति उत्सुक थे कि ये हिंदू पिकल का इतना सम्मान क्यों करते हैं। हालाँकि डिम्पल बाबा के उत्साह का सबसे बड़ा कारण यह था कि ब्रह्मऋषि डिम्पल घोषित होने का बाद वह सामाजिक मर्यादाओं से इतर हो गए थे, और बक़ौल बाल ऋषि पूनावाला उन्हें भाँग गाँजा की निर्बाध व्यवस्था का अधिकार था। बालऋषि के अनुसार- राहुल जी इज जस्ट लाईक दैट डूड फ्राम माऊँटेन- शिव। सोच कर ही महर्षि डिम्पल के शरीर मे फुरेरियाँ उठी। नानी ने जब पवित्र वेटिकन के जल से ब्लेसित किया था तब उन्हें कहाँ भान होगा कि एक दिन उनका पौत्र हिंदू धर्म की दिशा तय करेगा। 
बहरहाल नव-नियुक्त ब्रह्मऋषि डिम्पल बाबा ने, घड़ी को देखा। बारह बज गए थे और प्रात: सूर्य वंदना का समय था। रोलेक्स राजर्षि को भी अब पहुँच…

लँगड का एमाराई

(Hindi Satire, inspired by immortal writing of late  Shri Shrilal Shukl and his legendary Novel- Rag Darbari)


लंगडवा एम आर आई करवाने का सोच रहा था। फिर सोचा पता नहीं मशीन कहाँ कहाँ से जुड़ी होगी।

खन्ना मास्टर लंगडवा के उहापोह को बड़े ध्यान से देख रहे थे। ग़रीब का कष्ट अमीर को सदा ही ध्यानाकर्षक लगता है। उसी में उसकी आत्मा का उद्धार और राजनीति का चमत्कार छुपा होता है। खन्ना मास्टर जवान और जोशीले थे। चमकीली वास्केट पहनते थे, और गंजहा की जगह ख़ुद को गंजावाला कहलाना पसंद करते थे।

गंजावाला अपना चश्मा लहराते बालों में धकेल कर, मनुहार के लहजे में बोले - “जाओ हो, काहे घबराते हो? कब तक वैद जी के पीछे घूमते रहेगे? क़स्बा क्लीनिक जा कर एमाराई करा लो।”

“हमको थोड़ा डर लग रहा है।”

लंगडवा गंजावाला के उत्साह से भयभीत हो गया। अमीर आदमी ग़रीब के सुख में अचानक रुचि लेने लगे तो अक्सर ग़रीब के लिए भय और भ्रम का कारण होता है। एक राजकुमार पहले उत्साहित हुए थे तो जवाँ मर्द कंबल और ट्राजिस्टर प्राप्त कर के लौटे थे। उसके बाद उनके घर कभी किलकारियाँ नही सुनाई पड़ी , बस मुफ़्त के रेडियो में बिनाका गीत माला सुनाई पड़ती…

Know the Naxals- A brief look at the History

There have been many debates of late on the television, in the wake of the arrests of those who are now increasingly mentioned as the Urban Naxals. I am both shocked and amused at the same time to look at the audacity of the sympathizers of Naxal terrorism, in all their starched Saris and handloom Kurtas, when they hide behind the same constitution, that the want to overthrow. They are shrill, sophisticated, eloquent and deriding. They hate the common folks, and their disdain for those who work, create and make a living, peeps through their elitist smiles. They are mostly ideologues (yes, that is some work for sustenance in the modern scheme of things), academics and well, ostensibly, writers and poets. The fact remains that when communism is the scheme of things, Naxal notices mentioning Jan Adaalats in the villages of Chattisgarh too become work of art, and corpses hanging from the electricity poles, become equivalent of art work on the roof of Sistine chapel.
The other day, Ms. Arun…