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सभा पर्व- मोदी-रेणुका संवाद And English Translation




विगत दिनों महिला सशक्तिकरण की पुनर्व्याख्या दो प्रसंगों में हुई- एक वामपंथी, आधुनिक कवि अल्पवयस्क कन्याओं से अनुचित अनुरोध करते पकड़े गए; दूसरी घटना तब हुई जब कांग्रेस नेता रेणुका चौधरी के प्रधानमंत्री के भाषण के मध्य संसद में अनुचित, अभद्र  अट्टहास करती हुई पाई गईं और नरेंद्र मोदी के संक्षिप्त कटाक्ष का केंद्र बनीं। 

एक चमत्कारी करतब से पहली घटना में आधुनिक महिलाएँ दोषी पुरुष के साथ दिखीं, जबकि प्रधानमंत्री के भाषण, और उसके माध्यम से संसद की अवमानना करने वाला अट्टहास महिला-मुक्ति का परचम बन गया। पत्रकार महिलाएँ, लेखिकाएँ रेणुका जी को तमाम शोषित महिलाओं का प्रतीक बना कर मैदान में उतरी। अवसर ऐसा बना कि गिद्ध कबूतर के, शेर ख़रगोश के नाम पर सहानुभूति बटोरने चल पड़ा। 

अतिउत्साह में योद्धा महिलाएँ क्षितिज के विपरीत किनारों से मैदान में उतरीं। एक तरफ़ रेणुकाजी के राक्षसीकरण का विरोध था, दूसरे छोर पर शूर्पणखा के दैविकरण का प्रयास था। व्हाट्सएप के इतिहास में दो विपरीत संदेशों के कारण रेणुका प्रसंग काले अक्षरों में लिखा जाएगा। 

फ़ेमिनिस्टों के सागरिका समूह का मानना था कि सुश्री शूर्पणखा एक प्रेममयी महिला थीं, जिन्हें श्री राम की पौरूषिक अत्याचार का सामना करना पड़ा। इसी भावनावश पूरी कथा में उन्होंने ऊपर सीता जी को साध्वी प्रज्ञा की भाँति इंटरनेट हिंदू मान कर अपने प्रेम का पात्र मानने से इंकार किया। उस प्रेममयी महिला का तिरस्कार, इस महिलाधिकार कार्यकर्ता के लिए पुरूषसत्तात्मक समाज का सूचक था। यक्ष प्रश्न यह है कि पहली पत्नी के होते हुए दूसरी पत्नी स्वीकार करना क्या पुरूष-प्रधान व्यवस्था का सूचक नहीं होता? श्री राम नें पहले ही अवसर पर अपनी वैवाहिक अवस्था बताई, क्या शूर्पणखा का प्रणय निवेदन, पत्नी के समक्ष मर्यादित कहा जाएगा? 

श्रीराम-शूर्पणखा वार्ता के प्रारंभ में राम कहते हैं- 

"इयं भार्या च वैदेही मम सीतेति विश्रुता "

(यह विदेह-नरेश की पुत्री एवम् मेरी पत्नी है जिसे सीता के नाम से जाना जाता है।)

शूर्पणखा कहती है, सीता समक्ष ही- 

"विकृता च विरूपा च न चेयं सदृशी तव

अहमेवानुरूपा ते भार्या रूपेण पश्य माम्।"

(कुरूप ओर विरूपित सीता तुम्हारे किस योग्य है, मैं ही तुम्हारी उचित संगिनी हूँ।)


श्री राम कहते हैं- 

"कृतदारोस्मि भवति भार्येय दयिता मम
तद्विधानां तु नारीणां सुदु:खा ससपत्नता।"

मैं विवाहित हूँ और मेरी पत्नी मुझे प्रिय है, दूसरी पत्नी बन कर तुम्हें दुख ही प्राप्त होगा। 

राम के द्वारा हतोत्साहित किए जाते ही निश्छल प्रेममयी, उत्साहपूर्वक शूर्पणखा लक्ष्मण की दिशा में मुड़ती है जो ख़ुद को श्रीराम का सेवक बता कर उसे वापस राम की ओर भेजते हैं। 

अब सुश्री शूर्पणखा समझ चुकी हैं कि सीता को मार्ग से हटना होगा, और दंडकारण्य ही होटल लीला बनेगा। यह समझ कर निश्छल, मृदुल शूर्पणखा कहती हैं- 

"अद्येमां भक्षयिष्यामि पश्यतस्तव मानुषीम्।
त्वया सह चरिष्यामि निस्सपत्ना यथासुखम्।।"

मैं अभी इस मनुष्य कन्या का भक्षण करूँगी और मुझे दूसरी पत्नी होने का दुख नहीं सहना होगा।

यह कह कर शूर्पणखा ने सीता पर आक्रमण किया।

इसपर राम ने पत्नी की रक्षा की और लक्ष्मण को शूर्पणखा को दंडित करने को कहा। शूर्पणखा प्रसंग में श्री राम अपनी धर्मपत्नी के अधिकार एवम् विवाह की संस्था की रक्षा में खड़े थे। शूर्पणखा के सम्मान में खड़े लोगों के निशाने पर श्रीराम हैं, यह उनके लिए महिला के सम्मान का नहीं, हिन्दू अवमानना का अवसर है।


अब दूसरे छोर का प्रश्न कि मोदी का कटाक्ष महिला सम्मान पर आघात है। यह प्रश्न स्वतंत्रता का नहीं, सभ्यता का है। रेणुका जी संसद की अवमानना कर रही थी, निर्वाचित प्रधानमंत्री की अवमानना कर रही थीं। महिलाओं की मुक्ति का हर समझदार व्यक्ति समर्थन करता है। हम सब महिलाओं के मुक्त होने का समर्थन करते है, हम सिर्फ़ कुछ महिलाओं के मूर्ख होने के कथित अधिकार का विरोध करते हैं। 

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(Click Here to read in English- Hypocrisy of Hyperventilating Fake Feminists)

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