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लँगड का एमाराई

(Hindi Satire, inspired by immortal writing of late  Shri Shrilal Shukl and his legendary Novel- Rag Darbari)


लंगडवा एम आर आई करवाने का सोच रहा था। फिर सोचा पता नहीं मशीन कहाँ कहाँ से जुड़ी होगी।

खन्ना मास्टर लंगडवा के उहापोह को बड़े ध्यान से देख रहे थे। ग़रीब का कष्ट अमीर को सदा ही ध्यानाकर्षक लगता है। उसी में उसकी आत्मा का उद्धार और राजनीति का चमत्कार छुपा होता है। खन्ना मास्टर जवान और जोशीले थे। चमकीली वास्केट पहनते थे, और गंजहा की जगह ख़ुद को गंजावाला कहलाना पसंद करते थे।

गंजावाला अपना चश्मा लहराते बालों में धकेल कर, मनुहार के लहजे में बोले - “जाओ हो, काहे घबराते हो? कब तक वैद जी के पीछे घूमते रहेगे? क़स्बा क्लीनिक जा कर एमाराई करा लो।”

“हमको थोड़ा डर लग रहा है।”

लंगडवा गंजावाला के उत्साह से भयभीत हो गया। अमीर आदमी ग़रीब के सुख में अचानक रुचि लेने लगे तो अक्सर ग़रीब के लिए भय और भ्रम का कारण होता है। एक राजकुमार पहले उत्साहित हुए थे तो जवाँ मर्द कंबल और ट्राजिस्टर प्राप्त कर के लौटे थे। उसके बाद उनके घर कभी किलकारियाँ नही सुनाई पड़ी , बस मुफ़्त के रेडियो में बिनाका गीत माला सुनाई पड़ती थी। ग़ज़ब का समय था जब जेल घर जैसा और घर जेल जैसा मालूम होता था। हाँ, रामाधीन जी कहते थे, ट्रेन समय से चलने लगी। लंगडवा पैदल ठीक न चला तो ट्रेन से कहाँ जाता। बहरहाल!

लंगडवा को सोच में डूबा देख कर गंजावाला खीझ गए। ऐसे विचारशील ग़रीबों के कारण ही देश में क्रांति नहीं आ पा रही है। इनका साथ वैदजी का हाथ और बद्री पहलवान की लात ही दे सकते हैं।

ऐसे नीरस निर्धनों के कारण ही गाँव में वैदजी की सत्ता और छंगामल विद्यालय में प्रिंसिपल साहब की सरकार अनवरत चले जा रही थी।
खन्ना मास्टर लंगडवा को फिर से टहोके- 

“अबे जाओ ना, डरते काहे हो? बेसी सोचते हो इसी से तुम्हारा घुटना टूटा है, सोचते भी तो घुटनवे से हो, और तिस पर इतना। गाँधी बाबा के चेले ऐसे सोचते बैठते तो आ चुकी थी आज़ादी। तुम्हारे जैसे लोगों की वजह से विकास नहीं हो रहा है, सड़क नही बनती, ट्रेन समय से नहीं चलती- और तुम दोष देते हो चाचा को जो आज़ादी लाए, और चचा के नाती को, जो कम्प्यूटर लाए, और विदेश से विवाह करके एक देवी लाए जिन्होंने हमें डिम्पल कुमार दिया। और तुमने उनको सत्ता से बाहर कर दिया। क्यूटनेस का तो कोई भैलू ही नहीं है। ऐसे राष्ट्र का भला क्या होगा जिसे सौन्दर्य और सरकार दोनों का सम्मान ना हो। और डिम्पल बाबा ऐसे कृतध्न लोगों के लिए अमरीका से कृत्रिम बौद्धिकता ला रहे थे। वास्तविक बौद्धिकता तो वैसे ही पुरस्कार लौटा कर, वाईन पी कर कुंभकर्ण निद्रा में जा चुकी थी।

कुछ तो लज्जा करो, लँगड ।”- खन्ना मास्टर खिन्न हो कर बोले। 

लँगड ने घबरा कर फटी बनियान को नीचे को खींचा। पर तुरंत समझ में आया कि खन्ना मास्टर का तात्पर्य शारीरिक लज्जा से नहीं था। खन्ना मास्टर उद्वेलित थे। खड़े हो गए। दीवार पर लगे पोस्टर को इंगित कर के बोले- 
“देखो, इस क़स्बे के विकास के मार्ग में तुम्हारी पिछड़ी सोच है। तुम एमाराई कराओगे तो तुम्हारा क्या जाएगा? डिम्पल बाबा की नई चुनावी योजना की जयकार होगी, सुन्दर नेता राष्ट्र का नेतृत्व करेगा।”

खन्ना मास्टर जोश में यूँ बोल रहे थे मानो लाखों लँगड उनकी वाणी का प्रसाद पाने ऊँकडू बैठे हो।

खन्ना मास्टर ख़ुद को संभाल कर बड़बड़ाए - 
“हम दलित होते तो हम ही एमाराई करा के फ़ोटो खिँचा लेते।”

किन्तु दिव्य देवी का साफ़ निर्देश था, पहला एमाराई दलित का ही होना था। लेकिन लंगडवा को पता नही कौन जुड़े हुए एमाराई का बता गया था। अब यही बात उनके भविष्य पर कुँडली मार बैठ गई थी।

पोस्टर दिखा कर फिर वाणी पर संयम धरते हुए खन्ना मास्टर बोले- 
“देखो कितनी सुन्दर मशीन है।”

लँगड शंकित मन से बोला- “वो गुफानुमा चीज़ फ़ोटो में क्या है?”

मास्टर मुस्कुरा पड़े- “अरे मेरे भोले लँगड, वही तो एमाराई है। इसी में तुमको डालेंगे।”

“लेकिन रुप्पन बाबू कहते थे कि डिम्पल बाबा भाषण में कह रहे थे ये मशीन दूसरा मशीन से जुड़ा है, फ़ोटू में दुसरका मशीन नही दिख रहा है।”

खन्ना मास्टर का धैर्य रुप्पन बाबू का नाम सुन कर और टूट गया। ‘ज़रूर प्रिंसिपल साहब के कहे से रुप्पन बाबू लंगडवा का कान भरे हैं’ सोच कर खन्ना मास्टर क्रोधपूर्वक किनारे रजनीगंधा थूके और बोले- 

“तुम ग़रीब लोग सबका बात मान लेते हो, यही समस्या है।
अरे, ये मशीन कहाँ जुड़ा है, दूसरा मशीन तीसरे से कहाँ जुड़ा है, इससे तुमको क्या। डिम्पल बाबा ख़ानदानी आदमी हैं, तुम्हारा ही नुक़सान करने बैठे हैं?तुम्हारे लिए बाबा सत्ता त्याग कर भी देश विदेश भटक रहे हैं, फटी जेब वाला कुर्ता पहनते हैं, रात को दिन में उठते हैं, दिन को रात में सोते है। समझ में नहीं आता कब क्या करते हैं। राजपरिवार के व्यक्ति इतना कष्ट उठा रहे हैं, और तुम जैसे लोगों को भरोसा ही नहीं है।डिम्पल बाबा, उनका परिवार, उनके जीजाजी तक, सब ज़मीन से जुड़े हैं तभी तुम जैसे के लिए संघर्ष कर रहे हैं वरना उनको कौन कमी है?” 

खन्ना साहब इमोशनल कार्ड खेले।

अब यही समय का खेल देखें, जोगनाथवा को तभी धमकना था। मुस्कुरा कर बोला- “

हाँ लँगड, खन्ना मास्टर ठीक कह रहे हैं, पूरा ख़ानदान ज़मीन से जुड़ा है, जहाँ ज़मीन देखता है, वहीं जुड़ जाता है।” 

खन्ना मास्टर भान गए कि ये अब खेला बिगाड़ेगा । लँगड को कोहनी से थाम कर किनारे ले गए।
बोले- 

“देखो तुम उ सब का बात मत सुनो। बस देखो एमाराई कराओ, एक पत्रकार फ़ोटो खींचेगा, बतला देना कि तुम दलित हो, और कहना कि ज़िला अस्पताल से तुमको भगा दिए काहे कि तुम्हारे पास आधार नहीं था।”

“लेकिन हम तो वहाँ नही गए?”

“हाँ, तो कौन धर्मराज तो तुम्हारी प्रतीक्षा में स्वर्ग मार्ग खोले खड़े है। 
जीवन में जैसे सदा सच ही बोले हो”
- खन्ना मास्टर कुढ़ कर बोले, और आख़िरी पत्ता खेले- 

“एमाराई कराओ, दू सौ रूपया मिलेगा।"

डिम्पल बाबा के चचा दू सौ रुपया में नसबन्दी करा देते थे, क्या खन्ना मास्टर एमाराई ना करा सकेंगे? खन्ना मास्टर ने मन ही मन ख़ुद को लताड़ा।

लंगडवा मन में पत्थर रख के चलने को तैयार हो गया कि जोगनथवा पुकारा- “सुनो ना लँगड, एक मस्त वीडिओ है, देख जाओ।”
लँगड मास्टर को देखे। मास्टर कहे - “जाओ, देख आओ।”

दोनों पेड़ के नीचे बैठ देखने लगे। खन्ना हैंडपंप पर कुल्ला कर के गुटखे के अवशेष निकालने लगे।

अचानक पीछे से लँगड की आवाज़ आई। 

“मास्साब, एमाराई नहीं करा सकेंगे।”

खन्ना मास्टर पलटे। “काहे? समझाए तो, शिवपालगंज की मशीन से ना निकले तो हज़रतगंज की मशीन से निकलोगे। तुम्हारे तो आगे नाथ ना पीछे पगहा। रहोगे तो गंजहे ना, चिंता का क्या विषय है?”

बिना उनकी तरफ़ मुड़े लंगडवा चलता गया। 

“डर जगह बदलने का नहीं है, मास्साब। मनुष्य जीवन बहुत कठिनाई से प्राप्त होता है, इसको नहीं छोड़ सकते। पता नहीं हज़रतगंज में कबूतर, बंदर, कुत्ता -क्या बन के निकलें।”

कह कर लँगड निकल गया। जोगनथवा लोट लोट हँस रहा था। 

खन्ना मास्टर झपटे। 

“दिखाओ तो क्या वीडिओ दिखा कर तुम लँगड के बरगलाए हो।” 



जोगनथवा ने फ़ोन खन्ना मास्टर को थमा दिया। उसमें डिम्पल बाबा रैली में कह रहे थे - “हम ऐसी मशीन लाएँगे जिसमें एक तरफ़ से आलू डालो, दूसरी तरफ़ सोना निकलेगा।” 

खन्ना मास्टर सिर पकड़ कर बैठ गए। 

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