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कांग्रेस संत समागम - Congress Sant Samagam


 
आज रात्रि जब प्रात:काल डिम्पल बाबा जागे, उनका हृदय नई ऊर्जा से प्रकाशमान था। कल ही काँग्रेस कार्यकारिणी ने उनकी तुलना किसी अचार से की थी और ध्वनिमत से सनातन धर्म का रक्षक बताया था। डिम्पल बाबा के बताया गया था कि अचार बनने के बाद हिंदू धर्म ध्वजा की रक्षा का दायित्व उन पर बैठता है। बाबा को खुद को पिकल कहा जाना पसंद तो नहीं आया था और वह जानना चाहते को अति उत्सुक थे कि ये हिंदू पिकल का इतना सम्मान क्यों करते हैं। हालाँकि डिम्पल बाबा के उत्साह का सबसे बड़ा कारण यह था कि ब्रह्मऋषि डिम्पल घोषित होने का बाद वह सामाजिक मर्यादाओं से इतर हो गए थे, और बक़ौल बाल ऋषि पूनावाला उन्हें भाँग गाँजा की निर्बाध व्यवस्था का अधिकार था। बालऋषि के अनुसार- राहुल जी इज जस्ट लाईक दैट डूड फ्राम माऊँटेन- शिव। सोच कर ही महर्षि डिम्पल के शरीर मे फुरेरियाँ उठी। नानी ने जब पवित्र वेटिकन के जल से ब्लेसित किया था तब उन्हें कहाँ भान होगा कि एक दिन उनका पौत्र हिंदू धर्म की दिशा तय करेगा। 

बहरहाल नव-नियुक्त ब्रह्मऋषि डिम्पल बाबा ने, घड़ी को देखा। बारह बज गए थे और प्रात: सूर्य वंदना का समय था। रोलेक्स राजर्षि को भी अब पहुँचना चाहिए था। संत सिब्बल यूकिलिप्टस के वृक्ष के नीचे आसन लगा कर उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। डिम्पल बाबा ने प्रण लिया था कि ओल्ड फ़ैशन वट वृक्ष या पीपल वृक्ष के स्थान पर उनका स्थान युकलिप्टस के तले होगा। पीपल और वट वृक्ष की तुलना में युकलिप्टस कितना युवा लगता है, और पत्तियों तथा धरती के बीच की दूरी बाल-ऋषि के भाई के जैसे धृष्ट लोगों को संदेश देती है कि ख़ानदानी पत्तों और ज़मीन के बीच की यह सम्माजनक दूरी कितनी आवश्यक है। अच्छा हुआ बालऋषि का विद्रोही भाई मैनेज हो गया अन्यथा काँग्रेस मुख्यालय के शौचालय की कुँडी पता नहीं क्या काम आ पाती। 

बहरहाल, डिम्पल बाबा ने आसन ग्रहण किया। संत सिबल ने प्रणाम कर के उनका स्वागत किया। डिम्पल बाबा के अधरों पर मुस्कान छा गई। ये दो व्यक्ति हैं, संत सिबल और औघड मलंग लालू जिन्हें देख अक्सर डिम्पल बाबा के मन मे विचार आता था कि क्या कोई व्यक्ति कानों से पेंटिंग कर सकता है? 

तब तक महात्मा शैम्पूस्वामी भी आ चुके थे। शैम्पूस्वामी कमाल के प्रतिभाशाली व्यक्ति थे और शादियों के अंतर्राष्ट्रिय कीर्तिमान बनाने को कृतसंकल्प थे। डिम्पल बाबा को विश्वास था कि कम से कम विवाह के संदर्भ मे उनके भूतपूर्व गुरू को अवश्य पटखनी देंगे। उनके भूतपूर्व गुरू व्योमकेश बख़्शी की नावेल पढ़ कर जासूसी की तरफ़ चल पड़े थे और महिला उद्धार का समस्त भार शैम्पूस्वामी के कँधों पर आ रुका था।

शैम्पूस्वामी भाषा पर भारी पकड़ और बुद्धिजीवी वर्ग मे घोर सम्मान रखते थे। युवा प्रतिभाओं पर वैवाहिक कीर्तिमान के संदर्भ से परे भी उनका खाया दखल था और विरोधी नेता के विरोध करने वाले हर व्यक्ति को भाषाविद, लेखक और समाजसेवी बना कर सार्वजनिक मँच पर उतारने की कला मे वह पारंगत थे। किसी भी बात को कोई भी मोड़ देने मे उनका कोई सानी न था। मसलन उनकी पुस्तक “मैं हिंदू क्यूँ हूँ” को हिंदू होने की व्याख्या, विरोध, विस्मय, विश्वास या ग्लानि - किसी भी रूप में पढ़ा जा सकता है। कल उन्होंने ही डिम्पल जी के ईवीएम विरोध को क्रान्तिकारी मोड़ देकर उन्हें ब्रह्मऋषि घोषित किया। उन्होंने ईवीएम को हिन्दू सिद्धान्त “वीर भोग्या वसुंधरा”!के विपरीत बताया। उन्होंने बताया कि परंपरागत मतदान के समाप्त होने के कारण बूथ कैप्चरिंग जैसी पुरुषार्थपूर्ण गतिविधियों का लोप होना हिन्दूओं मे भीरूता का कारण बताया। इस प्रकार डिम्पल बाबा ने तथाकथित हिन्दुवादी दलों की हिन्दुविरोधी साज़िश को उजागर किया। शैम्पूस्वामी की यही महानता, कि वे डिम्पल बाबा की छींक मे छुपे दर्शन पर भी ३०० पन्नों की पुस्तक लिख सकते थे,उन्हें डिम्पल बाबा के क़रीब लाती थी। सो उन्होंने पत्रकारों को, पत्रकारों ने जनता को समझाया और डिम्पल बाबा ब्रह्मऋषि घोषित हुए। हिन्दू धर्म-ध्वजा धारण करते ही रोलेक्स राजर्षि ने हिन्दू समाज के उद्धार की प्रार्थना प्रस्तुत की। राजर्षि प्रगतिशील हिंदू थे और रूढ़िवाद एवं अंधविश्वास से लड़ने को कृतसंकल्प थे। शैम्पूस्वामी ने बताया कि राजर्षि आज एक अंधविश्वास-विरोधी गोष्ठी के उद्घाटन मे जाने वाले थे परंतु पहले मुहूर्त नहीं बैठ रहा था, फिर निकलते समय उनकी गाडी पर कौवा बैठ गया। अत: वह सीधे बाबा के सत्संग में पहुँच रहे थे। 

पहुँचते ही उन्होंने बाबा को प्रणाम किया। पहले बैठे, फिर झुके और अंतत: लेट हो गए, जो उनकी मूल अवस्था थी। आँखें बँद, घोर चिन्तन। वह अकसर मंत्रीमंडल के बैठक मे इसी योगनिद्रा मे पाए जाते थे। आज की सभा मे कर्नाटक चुनाव मे हिंदू वोटों पर चिन्तन था। 

“हिन्दू हमें पिकल क्यों पुकार रहे हैं और नाराज़ क्यों हैं?” ब्रह्मऋषि ने प्रश्न अपने नेताओं की ओर और एक बिस्कुट कुत्ते की ओर फेंका। 

शैम्पू स्वामी  बोले - "बाबा, वो अचार  नहीं आचार्य कहते हैं।  इसका अर्थ है टीचर। "

बाबा को अर्थ समझ कर प्रसन्नता हुई किन्तु दूसरा प्रश्न बना हुआ था- "हिन्दू गुस्सा क्यों हैं?"

रोलेक्स ऋषि ने पहले शैम्पूस्वामी की ओर क्रोधपूर्वक देखा फिर बोले - 

“बाबा, हिंदू हमें गौ विरोधी मानते हैं। और इनके प्रदेश मे बछड़े का वध हुआ। बीफ पार्टी तक ठीक है, पर टीवी पर काटने को किसने बोला?” 

बाबा सोच में थे, अचानक बोले- “आप जनता को हमारे गौ प्रेम के बारे मे बताएँ। हमें गाय से बहुत प्रेम है। अब लोग पकाते ठीक से नहीं हैं और फिर इल्ज़ाम हम पर लगाते हैं। ठीक से नहीं पकाएँगे तो प्रेम कैसे आएगा?” 

शैम्पूस्वामी को भान हुआ कि बात विपरीत दिशा में जा रही है। बोले, “संत सिबल ने श्री सीता राम को काल्पनिक बताया इस लिए हिंदू नाराज़ है।”

“अरे तो नाराज़ हो के क्या कर लेगा?” संत सिबल भड़क कर बोले। “और राम मिथ हो या ना हो, हिंदू वोट आज के भारत का सबसे बड़ा मिथ है। हिंदू- विंदू कुछ नही होता, सब मन का वहम है। होता है जाट, गुर्जर, बनिया, बाभन, पटेल, यादव। होता है उत्तर -दक्षिण भारतीय। हिंदू अपने आप में कोई परिभाषित करने वाली वस्तु नहीं है। हिन्दू वोट वैसे ही है जैसा हमने पहले कहा था - २ जी लॉस की तरह- नोशनल, सांकेतिक, अयथार्थ।  जात से निकलेगा तो वर्ग में बटेगा - रूढ़िवादी, प्रगतिशील, अमीर, गरीब, शिक्षित, अशिक्षित। मोनोलिथ होता है मुस्लिम, ईसाई, वही सत्य है।  उस पर ध्यान दीजिए। इनके तो भगवान भी अलग हैं तो भगवा क्या एक होगा। ” 

रोलेक्स ऋषि को ये इंटरवेंशन पसंद नहीं आया। बोले- “देखिए, आप संत आदमी हैं, राज्य सभा वाले, रोहिंग्या, आईसीस के मुक़दमे लड़ के घर चला लेंगे। हमें चुनाव लड़ना और जीतना होता है।” 


डिम्पल बाबा सोच मे थे। ब्ह्मऋषि को दैवीय संदेश की प्रतीक्षा थी। बाबा ने चाय के कप मे बिस्कुट डुबोया। आधा बिस्कुट गल कर गिर गया। बाबा की आँखें चमक उठी मानो डूड फ्राम माऊंटेन ने आवाज़ दी हो। बाबा ने डिम्पलयुक्त मुस्कान रोलेक्स ऋषि की तरफ़ फेंकी और बोले- “तोड़ो” 

संतों की मंडली पर एक अध्यात्मिक शाँति छा गई। हिंदू वोट का रहस्य खुल गया। डिम्पल बाबा सच ही ब्रह्मऋषि हैं। उनसे बेहतर हिंदुत्व के भेद कौन जानता है? शैम्पू स्वामी तेजी से डिंपल बाबा के मोनोसिलबिक सन्देश का मानवी भाषा में रूपांतर करने में व्यस्त हो गए। माता गांधारी द्वारा हिंदी भाषण की हाल में हुई दुर्गति के बाद कोई रिस्क लेना उचित नहीं था, नर्मदा को नर-मादा तक ले जाना तो ठीक था पर ये तो कुछ और ही  था, मीडिया हमारी न होती तो पता नहीं क्या होती। राजमाता का भाषण उनकी कमज़ोर भाषा और बात का दब जाना उनके चमत्कारी मीडिया मैनेजमेंट का सूचक था। 

जो भी हो हिन्दू धर्म को नया मार्ग प्राप्त हुआ था, और भारत के भूरे निवासियों को नया धर्म प्राप्त हुआ था, जिसे जन -सामान्य के बीच ले जाना आवश्यक था  बीच बीच में संत शैम्पू जी  डिंपल बाबा के आसन की तरफ देख कर प्रेरित होते थे।  पेड़ पे टिके बोर्ड पर लिखा था - कर्म की इच्छा मत करो, फल की कामना करो। ब्रह्मऋषि अपने नन्हे कुत्ते से खेलने में व्यस्त हो चुके थे।  हिंदुत्व सुरक्षित हाथों में था। 

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