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क्षमा बड़ेन को चाहिए


हर राष्ट्र का एक राष्ट्रीय भाव होता है। फ्राँस का राष्ट्रीय भाव कला है, ब्रिटेन का न्याय, अमरीका का स्वच्छन्दता, चीन का हर चीज़ का भाव लगाने का भाव, पाकिस्तान का गुंडई का, और भारत का क्षमा का। क्षमा हमारा राष्ट्रीय भाव एवम् राष्ट्रीय शग़ल हैं।
क्षमा माँगना और क्षमा प्रदान करना हमें व्यस्त रखता है। जब हमारे पास करने को कुछ नही होता तब हम निंदा करते हैं, जब करने का अवसर आता है तब हम क्षमा कर देते हैं।
क्षमा करने और माँगने से समाज में प्रवाह बना रहता है। अपशब्द बोलने वाले को बोलते समय परिणाम का भय नहीं होता, क्षमा माँगते समय उसमें लज्जा एवम् ग्लानि का भाव नहीं होता।
क्षमा करने और माँगने से समाज में प्रवाह बना रहता है। अपशब्द बोलने वाले को बोलते समय परिणाम का भय नहीं होता, क्षमा माँगते समय उसमें लज्जा एवम् ग्लानि का भाव नहीं होता।
क्षमा का गुण ही राजनीति मे मिथ्यावादिता एवम् अनर्गल आरोप प्रत्यारोप की परंपरा को जीवित रखता है। अनर्गल आरोप की परंपरा और क्षमा माँगने की महान कला का हमारे समय से लोप हुआ जा रहा था।

राजनीति का परिपेक्ष्य क्रूर, कुटिल एवं आनंदरहित है। एक समय राजनीति मे आनंद था। नेहरू जी ने संसद को चीन आक्रमण के बाद हफ़्तों तक झूठ की चाशनी बाँटी और फिर कह दिया ‘सारी’। कृतज्ञ राष्ट्र ने रोमाँचित होकर उन्हें क्षमा किया और भारत-रत्न दिया।

आज के समय में मिथ्या-भाषण स्तरहीन हो गया है, और क्षमा का भाव मिटता जा रहा है। राहुल जी चीन के राजदूत से, पूर्व प्रधानमंत्री पाकिस्तान के राजदूत से चुपके चुपके मिलते हैं, पहले खंडन करते है, फिर कहते हैं- तो क्या? क्या ऐसे धमकाने की जगह वह क्षमा नहीं माँग सकते थे?

क्षमा ना माँगने के स्वभाव से राजनैतिक आदान-प्रदान रूखा हो जाता है। लोग मज़ेदार आरोप लगाने से कतराते हैं।मसलन क्या मोदी जी जवाब देंगे कि मिशन मार्स के यान में उन्होंने नोटबंदी से पहले अपनी पार्टी का सारा काला धन मंगल पर भेज कर देश को गुमराह किया?

एक उत्तरदायी राजनीति क़तई रसहीन राजनीति होती है। क्षमा की फ़ैसिलिटी के अभाव मे क्या जन जीवन, क्या राजनीति- दोनों रसहीन हो जाते हैं। इसमें यह आवश्यक नहीं है कि आरोप तथ्यों पर आधारित हों और क्षमा ग्लानि पर। कश्मीरी नेता गिलानी पर और दिल्ली के नेता ग्लानि पर क्षमा नही माँगते।

क्षमा महँगे वक़ील और धन के अभाव मे असत्य को दूर तक खीँचने मे आने वाली कठिनाई से होता है। राजनीति मे बड़े बड़े लोगों के आने से क्षमा का प्रवाह रूक गया था। लोग गंभीर आरोप लगाते थे, और लोग उनका गंभीरता से उत्तर देते थे।

क्षमा की राजनीति के लिए व्यक्ति का छोटा होना आवश्यक है। जब संत केजरीवाल ने रामलीला मैदान से लाला रामदेव को हटाने के बाद पहली बार उद्घोषणा की- मैं छोटा आदमी हूँ- उन्होंने आरोप एवं माफ़ी की मनोरंजक राजनीति की पुनर्स्थापना की। व्यक्ति छोटा ना हो तो क्षमा माँग ही नहीं सकता।

केजरीवाल जी ने लुप्त होती क्षमा की परंपरा का पुनरोद्धार किया। कविवर ने खान साहब पर आरोप लगाया, केजरीवाल जी ने उन्हें पार्टी से निकाला, फिर क्षमा प्रदान कर वापस ले आए। क्षमा के हथियार से लैस केजरीवाल जी ने शब्दों से संकोच नहीं किया।

‘क्षमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उत्पात’ के सिद्धान्त पर चलते हुए खुद स्वघोषित छोटा आदमी बन कर उन्होंने जम कर उत्पात मचाया और आम जनता का भरपूर मनोरंजन किया।

क्या राजा, क्या प्रजा, क्या मंत्री, क्या फ़ौज- केजरीवाल जी ने बड़े छोटे मे आरोप प्रत्यारोप मे कभी भेद नहीं किया। सूचना का अभाव और घटना से दूरी से वह कभी प्रभावित नहीं हुए। असम से अंडमान तक के घटनाक्रम पर नज़र रखी और ‘’इज इट ट्रू’ कह कर मंत्री -संतरी सब पर समभाव से आरोप लगाए।

उन्होंने राजनीति मे न आने का प्रण लिया, फिर अन्ना जी से क्षमा माँग उतर गए। काँग्रेस का नाश करने का प्रण लिया, कार्यकर्ताओं से क्षमा माँग, समर्थन ले सरकार बनाई। कुछ महीनों मे जनता से क्षमा माँग कर सरकार छोड़ दी, और फिर रेडियो पर क्षमा माँग कर फिर सरकार मे आ गए।

सत्य आज के समाज मे दुर्लभ वस्तु है, हमें चाहिए कि हम उसका उपयोग कम से कम करें। ऐसे मे पकड़े जाने की संभावना और क्षमा के अस्त्र की उपयोगिता बढ़ जाती है। केजरीवाल जी ने इसका उपयोग एक महान योद्धा कि भाँति किया।

उन्होंने ‘इज इट ट्रू’ का फुदना लगा कर असत्य को इतनी कुशलता से उपयोग में लिया कि आज यह समाचार चैनलों के प्रिय शब्द - अलेजेडली - को टक्कर दे रहा है। उत्पात तो ऐसा मचा कि कबीर के शब्दों मे- 
“जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप।
जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ ‘आप’”


यह संत कबीर की दूरदर्शिता थी कि उन्होंने भविष्य मे इतनी दूर झाँक कर ‘आप’ और क्षमा का संबंध बाँधा। समय आ गया है इस लुप्त होती कला की रक्षा के लिए किसी चैनल के कानक्लेव मे केजरीवाल जी को सम्मानित किया जाए। पंजाब के इतिहास मे केजरीवाल समझौते का स्थान लोंगोवाल समझौते से कम न होगा

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