Skip to main content

महाभियोग पर महाभारत

Cartoon from Emergency with due credits- Congress hasn't changed much




 भारत बहुत ही मज़ेदार राष्ट्र है, सुप्रीम कोर्ट ने खाप पर प्रतिबंध लगाया। अब खाप जुटा है सर्वोच्च न्यायालय पर प्रतिबंध लगाने में ।

भारत में जनतंत्र आरंभ से ही ख़तरे में रहा है। कभी यह सत्तर के दशक के सिनेमा में नायक की माँ की तरह ख़तरे में रहा, कभी नब्बे के दशक के नायक की बहन के रूप में। ख़तरे के प्रकार और ख़तरे की तीव्रता घटती बढ़ती रही परंतु लोकतंत्र से ख़तरा कभी ना टला।

इस सबके बावजूद जनता की जनतंत्र में भारी श्रद्धा रही। जनतंत्र ख़तरे में है - की गुहार पर वो वीरता नसों में दौड़ जाती थी कि बहुधा यह संकट भी प्रस्तुत हुआ कि लोकतंत्र के रक्षकों से लोकतंत्र की रक्षा कैसे की जाए?

लोकतंत्र पर आए ख़तरे से लड़ने के लिए ही भारत में पहली बार आपातकाल लगाया गया। दो वर्ष तक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों को काँग्रेस के सुरक्षित गोदामों में छोड़ कर, एक सच्चे प्रेमी की भाँति कृतज्ञ राष्ट्र - तुम्हीं ने दर्द दिया है, तुम्हीं दवा देना - की तर्ज़ पर, सत्ता की ओर तकता रहा।

लोकतंत्र के चाचाजी की पुत्री ने विदेशी हाथ पर आक्षेप लगाया और न्यायालय को पलट दिया। एक जादुई परिवेश में भारत भटकता रहा जहाँ कोई भी युवा, किसी भी शाम विलुप्त हो जाता था। ख़तरे में पड़े लोकतंत्र को ले कर चिंतित राष्ट्र छज्जे के नीचे खड़े युवा प्रेमी की भाँति धनिया लाता रहा।

राष्ट्र सब्जीवाले से प्रेमिका के लिए मुफ्त धनिया लाता रहा; चाचाजी गुलाब टाँगे घूमते रहे, राष्ट्र उनका बिगड़ा लैम्ब्रेटा कल्लू मकैनिक के यहाँ जाकर कर्तव्यनिष्ठा के साथ बनवाता रहा। मध्यवर्गीय शहर के मध्यवर्गीय प्रेमी की भाँति जनता के हाथ सत्ता के हवाई चुंबन के अतिरिक्त कुछ न लगा।

पुराने कवि कह गए है कि सच्चा प्रेम प्रतिरोध से ही परवान चढ़ता है। जब तक कन्या के दो मुस्टंडे भाई हड्डियों का कीर्तन कराने को उपलब्ध ना हों तो प्रेम तरीक़े से उफान नहीं मारता। उसी प्रकार लोकतंत्र भी अपने अप्रतिम सौन्दर्य का दर्शन तब तक नहीं कराता जब तक वह ख़तरे में ना हो।
पीछे परिवर्तन बस ये हुआ कि आपातकाल वाली आँटी की दो पीढ़ियाँ गुज़र गईं और काँग्रेस को एक आयातित अभिभाविका की स्नेहछाया में लालन पालन का अवसर प्राप्त हुआ। जनतंत्र अब भी बराबर ख़तरे में बना रहा, बस विदेशी हाथ के आरोप की लज्जा त्याग कर अंदरूनी शक्तियों पर आरोप लगा।

चंद्रमुखी युवराज ने स्वयं के सत्ताच्युत होने को स्वतंत्रता उपरांत लोकतंत्र पर उतरने वाला सबसे बड़े ख़तरे का सूचक माना। भला वह कैसा लोकतंत्र जो उन्हें सिंहासन पर स्थापित करने का पुण्य कार्य करने में असफल रहे। यह लोकतंत्र की हार है, प्रजातंत्र की पराजय है।

राजपुत्र के चेलों ने उन्हें सूचित किया कि आपातकाल के समय से न्यायपालिका का कर्तव्य रहा है कि कटप्पा के स्तर की स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करे। जिस लोकतंत्र में सत्ता राजकुल के पास न हो, वह लोकतंत्र लज्जाजनक है, और जो न्यायपालिका इस त्रुटि का सुधार न करे, वह न्यायपालिका निरर्थक !

ऐसी न्यायपालिका उस नारियल की तरह है जो ऐसे बीमार व्यक्ति को देखने आने वाला दे गया हो जिसे डाक्टर ने छिलके के साथ फल खाने की सलाह दी हो। न्यायपालिका ने दही हाँड़ी की ऊँचाई तय की तो राजपुत्र ने न्यायाधीश की उड़ान की ऊँचाई की सीमा ही तय करने का प्रण लिया।

सज्जनों के समाज में न्यायालय  जेबकतरे को जेल भेजता है, जेबकतरों की
दुनिया में जेबकतरा न्यायालय को जेल भेजता है। राजपुत्र ने अपनी पार्टी के नेतागणो को देख निर्णय लिया कि यह देश जेबकतरों का है, और उनका दल उस जेबकतरा-बाहुल्य जनसमुदाय का प्रतिनिधि।


ऐसे में लोकतंत्र पर मँडराते ख़तरे से देश को बचाने का महान कर्तव्य उनके ज़मानत पर मुक्त हुए कर कमलों पर आ रुकता है कि जेबकतरों की ओर से वह न्याय को कारागार में भेजें। कल अदालत ‘की’ पेशी है, आएँ, और लोकतंत्र के पुनरूद्धार का यह महान खेला अवश्य देखें। 

Comments

Popular posts from this blog

Know the Naxals- A brief look at the History

There have been many debates of late on the television, in the wake of the arrests of those who are now increasingly mentioned as the Urban Naxals. I am both shocked and amused at the same time to look at the audacity of the sympathizers of Naxal terrorism, in all their starched Saris and handloom Kurtas, when they hide behind the same constitution, that the want to overthrow. They are shrill, sophisticated, eloquent and deriding. They hate the common folks, and their disdain for those who work, create and make a living, peeps through their elitist smiles. They are mostly ideologues (yes, that is some work for sustenance in the modern scheme of things), academics and well, ostensibly, writers and poets. The fact remains that when communism is the scheme of things, Naxal notices mentioning Jan Adaalats in the villages of Chattisgarh too become work of art, and corpses hanging from the electricity poles, become equivalent of art work on the roof of Sistine chapel.
The other day, Ms. Arun…

राहुल गाँधी की आधुनिक महाभारत - Rahul Gandhi's Mahabharat

राहुल गाँधी की आधुनिक महाभारत (Below is Rahul Gandhi's Interpretation of Mahabharat)
आज से कोई १००० वर्ष पूर्व महाभारत का युद्ध हुआ। रोमिला आँटी के अनुसार क़रीब 900 AD के आस पास का काल महाभारत बताया जाता है।

महाभारत युद्ध के काल मे ‘यंग इंडिया’ के अध्यक्ष मोतीलाल वोरा अँकल सच मे युवा भारतीय थे और धृतराष्ट्र जी को युद्ध का वृतांत बताने वाले संजय के टी वी का एँटीना घुमा कर वही एडजस्ट कर रहे थे।
धृतू अँकल को कुछ नहीं दिखता था, बिल्कुल मन्नू अँकल जैसे, और उनके जीवन का उद्देश्य भी युवराज के मैच्योर होने तक सत्ता की रक्षा करना था। समस्या वहाँ भी यही थी कि लाख प्रयास करने पर भी युवराज मैच्योर ना हो पा रहे थे, और माता गाँधारी युवराज को राष्ट्र पर ठेले पड़ी थीं।
माता गाँधारी ने गाँधार से भारत  आने के बाद लगभग दशक तक भारत मे बसने के बारे मे विचार किया। गहन विचार के उपरांत उन्होंने भूरे रंग के भारतियों के उद्धार का निर्णय लिया।  मूढ़ मगज भारतीयों ने उनके उनके इक राष्ट्र का उद्धार करने के भार का निरादर कर के उन्हे सत्ता को संभालने नहीं दिया। तब जाकर राजमाता को भारतियों को अति- प्रिय त्याग का लडडू…

बसेसर कुछ नहीं समझता

बसेसर कुछ नहीं समझता

स्मार्टफ़ोन की पिछले साल खुली फ़ैक्टरी से बाहर आकर उसने टैक्सी पकड़ ली। आज तनख़्वाह मिली थी। इस महीने घर के लिए ज़्यादा पैसे भेजने थे। जानता था पिताजी के चेहरे पर पिछले दशकों से गिरी झुर्रियों के कैक्टस मे मुस्कान का सूरज उगेगा। पुत्र के भेजे पैसे पिता का घर नहीँ चलाते पर रिश्ते की निरंतरता के लिए आवश्यक होते हैं और सफ़ेद मूँछों को सम्बल होते हैं। माँ ज़रूर चिंता करेगी कि सब पैसे ख़र्च करेगा तो प्रायवेट नौकरी में उसके ख़ुद के बुढ़ापे का क्या होगा? उसने सोचा इस बार माँ को प्रधानमंत्री पेंशन स्कीम के बारे में ज़रूर बताएगा। कब तक माँ उसे बच्चा ही मानती रहेगी और उसके बुढ़ापे की फ़िक्र भी अपनी पीठ पर ढ़ोती रहेगी। माँ ही अपने पुत्र में आता बुढ़ापा और जाता बचपन एक साथ रूका हुआ देख सकती है। याद आया, माँ को देखे बहुत समय हो गया। मन कमज़ोर हो गया। माँ की याद से हमेशा ही ऐसा होता है, मन बालक होने के व्याकुल हो उठता है। याद आया बचपन में चूल्हे के पास बैठ पहाड़े याद करना और ममता की आत्मा को धीमे धीमे, हर रोज़, धुएँ में बुझते हुए देखना।
पिछले दो महीने से फ़ोन पर माँ की खाँसी कम औ…