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अनशन के आवश्यक अंश

अनशन के आवश्यक अंश

भारतीय राजनीति में भूख का अभूतपूर्व स्थान है। बँग-भंग के समय से भूख भारतीय राजनीति की दशा का निर्धारण करती रही है और राजनीति के रथ के पहिए की धुरी रही है। एक प्लेट पूड़ी सब्ज़ी राजनैतिक जनसभाओं की सफलता का, और ग़रीबों की थाली में सजी भूख चुनावी निर्णयों का निर्धारण करती रही है। यह चुभती हुई भूख जो पुरूषों के पौरुष और नारियों के सतीत्व का सौदा बन के सात दशकों तक ऐसे समाज में सन्निहित हो गई कि आम भारतीय -ऊ तो होबे करता है - कह कर निकल लेता है।

किन्तु इस राजनैतिक छल और प्रशासनिक विफलता के चूहों द्वारा खाए गए फ़ूड कार्पोरेशन के अनाज से क्रान्ति नहीं होती। क्रान्ति होती है स्वैच्छिक भूख से जिसकी नींव गाँधी जी ने डाली और जिसे उन्होंने हर सामाजिक प्रश्न के समाधान के रूप में भारतीय जनता के सामने परोसा। 

इस भूख के शस्त्र को हर मिडिल क्लास युवक ने अपनी बात मनवाने को भोजन त्याग कर चुपके से पिज़्ज़ा आर्डर करते हुए उपयोग किया है। श्री अन्ना हज़ारे एवम् श्री अरविंद केजरीवाल ने इस लुप्त होती कला का पुनरूत्थान किया। भूख के इस शस्त्र रूप के लिये कई चीज़ेो की आवश्यकता होती है और इस स्वैच्छिक, राजनैतिक भूख को हम भूख हड़ताल कहते हैं। इसी शस्त्र के साधन से राजनेताओं द्वारा सूखे पत्तलो से सत्ता के समोसों तक का सफ़र तय किया जाता है।

एक सफल भूख हड़ताल ऐसे नहीं होती कि आप पर चिन्तित मुद्रा में धम्म से बिस्तर पर गिरे और अनशन हो गया। इसके लिए एक अदद तंबू, लाऊडस्पीकर, मीडिया और चंद छुटभैये नेताओं और चमचों की आवश्यकता होती है। इस घटनाक्रम में समर्थकों की भूमिका अनशनरत नेता की तोंद को लगातार चादर से ढाँपने, खाद्य सामग्री स्मगल करने, धार्मिक कैलेंडर पर प्रभु के श्री चरणों में पड़े भक्तों की मुख मुद्रा के साथ स्टेज पर रहने के अलावा सिद्धांत और सत्ता के मध्य का संवाद एवम् संतुलन बनाए रखने आवश्यक है। यह इन समर्थकों का ही पुनीत कर्तव्य होता है कि नेता जी सिद्धांत के संघर्ष में शहीद न हो जाएँ। 


जब एक नेता जी, अपने मैनिक्यूर्ड लान से निकल कर, वातानुकूलित बँगलों को त्याग कर राजघाट या जंतर मंतर के तंबू युक्त मंच पर अवतरित होते हैं तो आत्म हत्या को जाता हुआ भूखा किसान ठिठक कर ठहर जाता है। उसकी भोली आत्मा सन-स्क्रीन लगे गोरे चेहरे पर उभरी स्वेद-बिंदुओं में अपने अश्रुपूरित अस्तित्व को भूल जाती है और नेताजी को अपनी ताज़ा ताज़ा बेवक़ूफ़ बनी जनता के भावुक भूख में सत्ता को जाता वह मार्ग दिखता है जो पिछले सत्तर वर्षों से ग़रीबी हटाने के नाम पर सत्ता के राज पथ पर ग़रीबी को सजाता रहा है। सत्ता के साथ प्रासंगिकता ही एक सैद्धांतिक या वास्तविक भूख हड़ताल की सफलता निर्धारित करती है। अपनी दो दिन की भूख के प्रश्न को ग़रीब नागरिक नेताजी की दो घंटे की भूख हड़ताल पर वोटों में लपेट कर न्योछावर कर देता है। 

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