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पुस्तक समीक्षा: Book Review - Katra Katra Dhup by Akshini

 पुस्तक समीक्षा:

क़तरा क़तरा धूप - कविता संग्रह 

कवयित्री : अक्षिणी भटनागर 





मुझे भय और संकोच होता है जानकारों के लेखन की समीक्षा करते हुए, पुस्तक के प्रति आशंकित होता हूँ, और अपनी साहित्यिक सामर्थ्य को ले कर आतंकित रहता हूँ। अक्षिणी जी से परिचय ट्विटर से है। पुस्तक प्राप्त होने के बाद मैं लम्बे समय, कोई महीना दो महीना, इसे देखता रहा और इससे भयभीत होता रहा। यदि कविता पसंद न आयीं, तो क्या समीक्षा करूँ और यदि पसंद आयी तो क्या मेरी योग्यता होगी एक अकवि होने के नाते उसकी समीक्षा कर पाने की। एक समस्या और रही आधुनिक कवियों के हर दुर्घटनाग्रस्त गद्य को कविता कहने की ज़िद, जिसमे आम तौर पर तमाम प्रचलित भावों को भेलपुरी निर्माता की कुशलता से जोड़ कर, यहाँ वहाँ नारी-मुक्ति, भूख, निर्धनता और कुछ अचंभित कर देने योग्य नग्नता को ठेल कर कवि निर्विकार भाव से कविताओं की रचना करता है। 

बहरहाल न पढ़ने के अपराधबोध ने पुस्तक को उठाने का साहस दिया, और जब पुस्तक के पृष्ठ पलटे तो पाया कि सारा भय निरर्थक था। पुस्तक अपठित छोड़ना असंभव हो गया। ऐसे कवि और लेखक कम हैं जो इस कारण से लिखते हैं क्योंकि जब तक ह्रदय के सरोकार वे पन्नों पर न उतार लें, उन्हें कलम कचोटती है। वे पढ़े जाने के लिए नहीं, लिखने के लिए लिखते हैं। अक्षिणी प्रस्तावना में लिखती हैं - 

'किसी हँसती आँखों की टीस पढ़ पाते हैं तो कवि हैं आप' 


और पढ़ते हुए ग़ालिब याद हो आते हैं -


'कहते हैं, जब रही न मुझे ताक़त -ए -सुख़न,

जानूँ किसी के दिल की, मैं क्यूँ कहे बग़ैर।'


सत्य है कि कलम का अर्थ क्या जो उसमे संसार का सरोकार न हो। कवि दूसरे के भाव अनकहे ही भाँप लेता है, और कलम की ताक़त से अनकही भावनाओं को शब्दों का आवरण दे कर इतिहास के लिए छोड़ जाता है, यही न कर सके तो दूसरों को समझ कर भी क्या करना है। अक्षिणी की कविताएँ स्वतःस्फूर्त हैं, स्वाभाविक हैं, सहज हैं। कवि के शब्द अपने परिष्करण के दम्भ के भार में डूबते नहीं हैं, कमल पुष्प की भाँति तैरते रहते हैं। एक विचित्र सी जीवन्तता इन कविताओं में पहली कविता से ही परिलक्षित होती है, जब हम एक जिद, एक विद्रोह रूप में कवि कहती हैं -

'बस एक कविता रोज़ की हो,

जोश की हो, होश की हो,

गाजरों तक दौड़ते 

खरगोश की हो

एक कविता रोज़ की हो।'


बचपन के मेलों में बुड्ढी के बाल वाली मिठाई की तरह रूई के फाहों सी हवा में तैरने वाली, गुलाबी, मीठी और निर्दोष कविता। साहित्य में प्रगतिशीलता इतनी अधिक हो गयी है कि सच्चे सरोकारों की और लौटने का समय आ गया है। अक्षिणी ऐसे भावों को स्वर देती मालूम होती हैं जब कविता 'बंद' में वह कहती हैं -

'सुनो दोस्तों 

एक बंद

रोज़ रोज़ के बंद 

के खिलाफ हो जाए.... ?

कब रखें..? 

देश जाए भाड़ में..... 


कवयित्री का साहस स्पष्ट दिखता है जब वह स्त्री को सम्बोधित कर के कहती है 


'श्रेष्ठ हो 

सो छोड़ दो पुरुष बनने का 

यह आत्मघाती यत्न।'


अक्षिणी जी की कविताओं में भावनाएँ प्रधान हैं, संवेदनाएँ स्वतंत्र। वे पाठक को अपने भाषा, शब्द ज्ञान से आतंकित नहीं करती, उससे संवाद साधती हैं। भाषा सुन्दर है, पुष्ट है पर संकुचित नहीं है, उर्दू रोकती नहीं है। भाषा की यह सत्यनिष्ठता कविताओं का प्रवाह बनाये रखती हैं। भाषा का अभिजात्य, संस्कृतनिष्ठता का दर्प भाषा को असहज नहीं बनाता, यह हिंदी का कमरा है जिसकी खिड़कियाँ खुली हुई हैं। अपनी लगभग ९० कविताओं में अक्षिणी जी का राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति स्नेह है, और व्यक्तिगत प्रेम भी एक निर्दोष औघड़ियत ओढ़े है, जैसा वे इस संकलन की अपनी अंतिम कविता में कहती हैं 

"जीवन एक कविता है... 

भावों की और उमंगों की, शोलों और पतंगों की,

मदमस्तों और मलंगों की, उर की पीर तरंगों की।"

 

अवश्य पढ़ें। भाषा और विचार दोनों उत्कृष्ट हैं। पुस्तक अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।  


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